' अच्छा नहीं लगता '
मन का खेल जानु मै
मन जीते जीत है
पर जानकर भी अन्जान
क्यों कि आज कुछ भी
अच्छा नहीं लगता
कल बहुत अच्छा था
सोचकर आगे बड़े
ज्यादा सुख कि कामना
सब कुछ है आज फिर भी
अच्छा नहीं लगता
क्या अच्छा क्या बुरा
इसी धुन में बड़ी हैरानी
कल जो अच्छा था
आज वही बुरा बना
इस लिए आज फिर
अच्छा नहीं लगता
मै काहु एक बात
क्यों उलझे हम
मेरा तेरा में अच्छा बुरा में
सब है उसका
जो सब का रखवाला
उसी को सौप दो सब कुछ
फिर देखो सब अच्छा लगेगा
और अब नहीं कहना
अच्छा नहीं लगता