Saturday, July 5, 2014

दिल की बात कविता में... … मैं अंजाना !

दिल की बात कविता में... … मैं अंजाना !

कुदरत की खुदाइ 
दिलों की दूहाइ !
जब होता है 
सब के अन्दर 
सब के लिये 
निस्वार्थ प्यार 
तब बरसे बीन 
बदल ये बरसात 
कुदरत की खुदाइ 
दिलों की दूहाइ !

इला इलाही का 
देखो ये आलम 
कैसे उसने भी 
सजाया इस 
दुनिया का रूप 
जो रहता नहीं 
इस दुनिया में 
और जिसे रहने 
दिया इस दुनिया में 
वो कुछ भी नही 
जाने इस दुनिया 
के बारे में..... 
कैसे होती है 
कुदरत की खुदाइ 
दिलों की दूहाइ !

पर अनोखा है 
ये खेल उसका 
हर चीज का है 
एक ही गुण 
सब को इस 
चक्र में है फिरना 
चाहे राजा हो 
या रंक 
ये चक्र कभी न 
रुकता और 
सब को मिलता 
सुनेहरा मौका 
यहाँ  पर आने 
और जाने का 
पर बहुत कम 
ही इस चक्र को 
जाने इस का आदि 
और अंत क्या है 
कैसे होती है 
कुदरत की खुदाइ 
दिलों की दूहाइ !






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