Tuesday, September 2, 2014

B.K.Commentaries................. High Spiritual Thoughts.

ओम शान्ति 

मैं मास्टर प्रथम पूजनीय आत्मा हूँ। 

हम सब ये जानते  है कि किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले श्री गणेश जी की पूजा होती है। गणेश जी को दिव्या बुद्धि प्राप्त थी। वह हर कार्य बहुत ही सुन्दर और विधि पूर्वक करते थे। उनके जीवन का एक प्रसंग बहुत ही प्रसिद्ध है। जब कार्तिक और गणेश जी को विश्व भ्रमण की बात कही गयी तो गणेश जी ने बुद्धि से काम लिया और वो अपने माता पिता को बीच में बिठाकर उनका चक्र लगया। और कहा मेरे लिए तो आप ही मेरी दुनिया है आप के बिना मैं कहा विश्व में आता। इसलिए गणेश जी को बुद्धि का देवता कहा जाता है। 

गणेश जी के जीवन की हर बात हमें साद गुणों से जोड़ता है साद मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा देता है। 
और उनका एक गयन भी है भक्ति में गाते है।' गणपति आयो बाबा रिद्धि -सिद्धि लायो ' इस का सही अर्थ ये है कि विधि से सिद्धि प्राप्त होता है। …………… 

वर्तमान समय सब मनुष्य आत्माओं में पांच विकार है। जिस के कारण मनुष्य दुःखी है। जब सब मनुष्य दुःखी हो तो दुःख से कैसे छूटे कौन छुड़ायेगा ? ये सवाल उठेगा। इस का विधि येही है। सभी आत्माओं के पिता परमात्मा ही एक ऐसा है। जो सदा पावन है। सुख -दुःख से न्यारा है। वाही दुःख हरता सुख करता है। उसी की याद से उन्हीं से बुद्धि का कनेक्शन जोड़ने से हम आत्मा दुःख से मुक्त हो सकते है। वही दिव्या बुद्धि के दाता है। 

जिनसे आज से पांच हज़ार साल पहले गणेश जी ने भी दिव्या बुद्धि पायी थी।  उन्हें विधि पूर्वक याद कर। 

तो क्यों न हम भी आज इसी विधि को अपना कर सिद्धि प्राप्त कर ले। ………… 

तो चले ………  आज हम और आप फिर से अपने को आत्मा समझ उस परमात्मा को याद करेंगे। …………

अपन को संसार की बातों से अलग कर स्वम् को आत्मा निश्चय कर। ………मन और बुद्धि के संकल्प द्वारा परमधाम की ओर उड़ान भरें। …

मैं आत्मा इस आवाज़ की दुनियाँ से दूर सूरज, चाँद , सितारों से पार पहुँच गयी हूँ। … जहाँ बहुत शान्ति है चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश है। इस प्रकाशमय अलोक में प्यारे बापदादा मेरा स्वागत कर रहे है। मैं आत्मा बापदादा की गोद में पहुँच गयी हूँ। बापदादा का स्नेह मुझ आत्मा को तृप्त कर दिया है। मैं आत्मा अतीन्द्रिय सुख में खो गयी हूँ। ................... 

बापदादा के साथ मैं आत्मा एक ओर उड़ान भरते हुवे परमधाम में पहुंच गयी हूँ जहाँ न आवाज़ है न संकल्प बस  डेड साइलेंस है। ……………… मेरी आत्मा परमधाम में परमात्मा के मिलन में डूब गयी है। 

बिन्दु रूप अवस्था में खो गयी है। बीज रूप में ठीक गयी है। ...................... 

परम शान्ति में खो गयी है। ............. शान्ति , शान्ति और शान्ति।      ( कुछ देर इसी अवस्था में रहे )

अब मुझ आत्मा को सच्ची शान्ति का एहसास हो चूका है। शान्ति में ही सब कुछ है। शान्ति ही शक्ति का आधार है।  शान्ति नहीं तो कुछ भी नहीं , शान्ति से ही हर कार्य की सुरवात होती है। शान्ति ही शुभ है शान्ति ही विधि है शान्ति से सिद्धि मिलती है। इस लिए कहा है, ओम में सब कुछ है। याने ओम माना आत्मा और आत्मा का स्वधर्म है शान्ति इसलिए स्वधर्म में सुख है। 

मैं आत्मा अब धीरे धीरे परमधाम से निकल कर अपने शरीर में भृकुटि में पहुँच गयी हूँ। में संकल्प करती हूँ 

मैं हर कार्य शान्ति में रहकर करुँगी ………अपने स्वधर्म को याद करते हुवे कर्म करुँगी। …

    …ओम शान्ति शान्ति  शान्ति 


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