मैं मास्टर गणपति हूँ। …
ओम शान्ति
गण का अर्थ है पवित्र और पति का अर्थ है स्वामी !..... पवित्रता में ही सब कुछ समाया हुआ है पवित्रता ही नवीनता है। स्वामी बनना है तो पवित्रता को धारण करना होगा और पवित्रता को धारण करना है तो गहन शान्ति में खो जाना होग अपने नीज़ स्वरूप में। …
तो चलिए अपने घर शांतिधाम में जहाँ से हमें शान्ति की प्राप्ति होगी। शांतिधाम ही हम आत्माओं का असली घर है। वही से मेरा आना और फिर जाना है। और वही अगम निगम का धाम है।
मैं अपने मन को कुछ समय लिए संसार की बातों अलग करते हुवे
शान्ति की अनुभूति के लिए मन और बुद्धि से शान्तिधाम की ओर उड़ान भर रहा हूँ। …
सूर्य, चाँद, सितारोँ से पार परमधाम की और जा रही हूँ। …
जैसे जैसे ऊपर जा रही हूँ। जीतना ऊपर जा रही हूँ उतना ही ये संसार छोटा होता जा रहा है
अब मैं आत्मा बहुत ऊपर आ गयी हूँ। … ये संसार ये धरती एक गेंद की तरह दिखाई दे रहा है। ....
अब मैं आत्मा और ऊपर परमधाम में पहुँच गयी हूँ। .... धरती , देह और देह के सम्बन्ध सब भूल गए है। …
अब मुझे चारो ओर प्रकाश ही प्रकाश दिखाई रहा है। … लाल सुनेहरा प्रकाश। ....
बहुत शान्ति है। न कोई आवाज़ है न कोई हलचल जैसे सब कुछ शान्त है। … सुन्न अवस्था है
डेड साइलेंस है। .... मेरी आत्मा शान्ति से भरपूर हो रही है। … इस दिव्या परलोक में एक बहुत ही सुन्दर
लाल प्रकाशमय ज्योति है। … उस ज्योति से शान्ति की किरणे निकल निकल कर मुझ आत्मा में
प्रवेश कर रही है। …… ये अनोखा अलौकिक मिलन मुझ आत्मा की जन्म जन्मांतर की थकान दूर
कर रही है।................. मैं आत्मा कही जन्मो के पाप व बोझ से मुक्त हो रही है। ..........
मैं आत्मा इस अनुभव को आपने साथ सदा बनाये रखूँगा। … वो मिठे परमात्मा मेरे प्यारे बाबा
आपका दिल से शुक्रिया.... शुक्रिया ....... शुक्रिया !!!
मैं आत्मा एक नयी चेतना और एक नयी शक्ति के साथ बाबा ( परमात्मा ) का शुक्रिया करते हुवे
वापस अपने कर्म भूमि पर अवतरित हो रही हूँ। ……………
परमधाम से नीचे , सितारोँ से नीचे। … धीरे धीरे चाँद से नीचे और सूर्य से नीचे उतर रही हूँ। …
मैं आत्मा आपने कर्म भूमि की ओर आ रही हूँ अब मुझे धरती एक गेंद की तरह दिखाई देने लगा है
मैं जैसे जैसे नीचे आ रही हूँ उतना ये धरती बडा बड़ा बनता जा रहा है। …
अब में आत्मा अपने शरीर में भृकुटि के मध्य में अपने सिंहासन पर विराजमान हो गयी हूँ
मैं हर कर्म साक्षी होकर दिव्य गुणों से युक्त होकर पवित्र मनसा से करुँगी। …
ओम शांति ओम शांति ओम शांति
ओम शान्ति
गण का अर्थ है पवित्र और पति का अर्थ है स्वामी !..... पवित्रता में ही सब कुछ समाया हुआ है पवित्रता ही नवीनता है। स्वामी बनना है तो पवित्रता को धारण करना होगा और पवित्रता को धारण करना है तो गहन शान्ति में खो जाना होग अपने नीज़ स्वरूप में। …
तो चलिए अपने घर शांतिधाम में जहाँ से हमें शान्ति की प्राप्ति होगी। शांतिधाम ही हम आत्माओं का असली घर है। वही से मेरा आना और फिर जाना है। और वही अगम निगम का धाम है।
मैं अपने मन को कुछ समय लिए संसार की बातों अलग करते हुवे
शान्ति की अनुभूति के लिए मन और बुद्धि से शान्तिधाम की ओर उड़ान भर रहा हूँ। …
सूर्य, चाँद, सितारोँ से पार परमधाम की और जा रही हूँ। …
जैसे जैसे ऊपर जा रही हूँ। जीतना ऊपर जा रही हूँ उतना ही ये संसार छोटा होता जा रहा है
अब मैं आत्मा बहुत ऊपर आ गयी हूँ। … ये संसार ये धरती एक गेंद की तरह दिखाई दे रहा है। ....
अब मैं आत्मा और ऊपर परमधाम में पहुँच गयी हूँ। .... धरती , देह और देह के सम्बन्ध सब भूल गए है। …
अब मुझे चारो ओर प्रकाश ही प्रकाश दिखाई रहा है। … लाल सुनेहरा प्रकाश। ....
बहुत शान्ति है। न कोई आवाज़ है न कोई हलचल जैसे सब कुछ शान्त है। … सुन्न अवस्था है
डेड साइलेंस है। .... मेरी आत्मा शान्ति से भरपूर हो रही है। … इस दिव्या परलोक में एक बहुत ही सुन्दर
लाल प्रकाशमय ज्योति है। … उस ज्योति से शान्ति की किरणे निकल निकल कर मुझ आत्मा में
प्रवेश कर रही है। …… ये अनोखा अलौकिक मिलन मुझ आत्मा की जन्म जन्मांतर की थकान दूर
कर रही है।................. मैं आत्मा कही जन्मो के पाप व बोझ से मुक्त हो रही है। ..........
मैं आत्मा इस अनुभव को आपने साथ सदा बनाये रखूँगा। … वो मिठे परमात्मा मेरे प्यारे बाबा
आपका दिल से शुक्रिया.... शुक्रिया ....... शुक्रिया !!!
मैं आत्मा एक नयी चेतना और एक नयी शक्ति के साथ बाबा ( परमात्मा ) का शुक्रिया करते हुवे
वापस अपने कर्म भूमि पर अवतरित हो रही हूँ। ……………
परमधाम से नीचे , सितारोँ से नीचे। … धीरे धीरे चाँद से नीचे और सूर्य से नीचे उतर रही हूँ। …
मैं आत्मा आपने कर्म भूमि की ओर आ रही हूँ अब मुझे धरती एक गेंद की तरह दिखाई देने लगा है
मैं जैसे जैसे नीचे आ रही हूँ उतना ये धरती बडा बड़ा बनता जा रहा है। …
अब में आत्मा अपने शरीर में भृकुटि के मध्य में अपने सिंहासन पर विराजमान हो गयी हूँ
मैं हर कर्म साक्षी होकर दिव्य गुणों से युक्त होकर पवित्र मनसा से करुँगी। …
ओम शांति ओम शांति ओम शांति
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