… अमन
इस समन्दर से सिमट कर आचमन हो जाईये।
क्या बिगाड़ेगा जगत, खुद में मगन हो जाईये।।
ये जगत तो बांधता है, मोह के जंजाल में
आप ऊपर जाईये, केवल गगन हो जाईये।
जो गुलों की और खारों की सियासत छोड़कर
बस महक अपनी लुटाए वो चमन हो जाईये।
पेहवन, ये पाठ पूजन, सब कथाएँ छोड़कर
राम तुमको गुन गुनाये, वो भजन हो जाईये।
दौड़ करके आज तक, कोई वहाँ पहुँचा नहीं
वो स्वयं आकर मिले, ऐसी लगन हो जाईये।
क्या मोहम्मद, राम , जीजस वो सभी की रोशनी
जो कबीरा में रहा, वो बाँकपन हो जाईये।
मन जहाँ तक साथ है जारी रहेगा ये सफर
छोड़िये भटकान सारे, बस अमन हो जाईये।
कवि - प्रमोद
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