Monday, December 8, 2014

दिल की बात कविता में.......स्वर्ग रूप स्वराज में तुम देश मेरा जागने दो।

स्वर्ग रूप स्वराज में तुम देश मेरा जागने दो। 
हे प्रभो, इस हेतु ही वरदान यह भी माँगने दो।।  

चित हो भयमुक्त जिससे और ऊँचा रह सके सिर। 
ज्ञान बाधित हो न जिससे साधना वह साधने दो।।
स्वर्ग रूप स्वराज में तुम देश मेरा जागने दो। 
हे प्रभो, इस हेतु ही वरदान यह भी माँगने दो।।

यह हमारी, वह तुम्हरी, यों विभाजित हो न वसुधा। 
संकुचित अशक्तियों के घोंसलों को त्यागने दो ।।
स्वर्ग रूप स्वराज में तुम देश मेरा जागने दो। 
हे प्रभो, इस हेतु ही वरदान यह भी माँगने दो।।

सत्य की गहरी जड़ों से प्रस्फुटित हों शब्द अपने ।
साधना निज पूर्णता की मत अधूरी छोड़ने दो ।।
स्वर्ग रूप स्वराज में तुम देश मेरा जागने दो। 
हे प्रभो, इस हेतु ही वरदान यह भी माँगने दो।।

निःसत्व रूढाचार के वीरान रेगिस्तान में। 
विमल प्रज्ञा-स्रोत अपना मत भटकने सूखने दो।।
स्वर्ग रूप स्वराज में तुम देश मेरा जागने दो। 
हे प्रभो, इस हेतु ही वरदान यह भी माँगने दो।।

जब विचारों और कर्मो में खिले मन की कली तो। 
बस तुम्हारी प्रेरणा को ही हृदय में खेलने दो।।
स्वर्ग रूप स्वराज में तुम देश मेरा जागने दो। 
हे प्रभो, इस हेतु ही वरदान यह भी माँगने दो।।

गीतकार - रवीन्द्रनाथ ठाकुर 

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