प्रेम
बहुतों ने प्रेम की परिभाषा लिखि है
प्रेम क्या है कैसा है प्रेम किसे कहते है
किसीने ऐसा भी कहा है
प्रेम नादान है
प्रेम में किसी का भान नहीं होता
न उम्र का न लोक - लाज का
प्रेम में कोई बन्धन नहीं
प्रेम ही जीवन है
प्रेम के आगे सब कुछ फीका है
प्रेम सब के जीवन में आता है
कभी दुःख में तो कभी सुख में
व्यक्ति का किसी न किसी से प्रेम होता है
ना कहने पर खुद से तो प्रेम होता ही है
जब अपना मन किसी के लिए विचार करे
तो समझ लेना वाही प्रेम है
कभी माँ - बाप तो कभी भाई - बहन
सब का हम से प्रेम होता है
कितने ही दूर हम उन्हें रखे
उनके प्रेम के सामने बाकी सब छोटा लगता है
प्रेम का संबंध भावना से है
भावना से ही मन का तार जुड़ता है
इसी कारण बिना जाने पहचानें भी
प्रेम हो जाता है
सच्चा प्रेम सब बंधनों से मुक्त होता है
देह और देह के बंधनो से भी परे
जहाँ अन्तर आत्मा और परमात्मा का
मिलान होता है
ये भी भावनाओं के तार से ज्ञान के मंथन से
प्राप्त होता है
आत्मा समझ परमात्मा से मिलान
मानना ही सच्चा प्रेम है
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