पंख
प्रेम कहाँ अब जीवन में
स्नेह प्यार का सत्कार
कहाँ अब समाज में
एक ही घर में रहते
सब मिलकर पर
वो प्रेम सत्कार
कहाँ अब जीवन में
सरहदें अब आसमान तक है
जमी तो जमी अब
आसमा की हदें बना रहे है लोग
वो प्रेम सत्कार
कहा अब जीवन में
राजसत्ता की पकड़ में
सत्य - वचन कहाँ
अब मानव के जीवन में
वो प्रेम सत्कार
कहाँ अब जीवन में
फूल, बाग, बागीचे
खरीदने वालों के हाथ
खुशबु ,महक ,सतगुण
कहाँ उनके जीवन में
वो प्रेम सत्कार
कहाँ अब जीवन में
रात दिन मैफिल
सजाने वालों की इस दुनिया में
काव्य का चिंतन मनन
कहाँ है इनके जीवन में
वो प्रेम सत्कार
कहाँ अब जीवन में
आधुनिक युग में मशीनों
की कल कल आवाजो में
वो मन की उड़न कहाँ
वो प्रेम सत्कार
कहाँ अब जीवन में
जप तप से निकरेगा
मन वचन कर्म
कर तू अब ईबादत
उस परमात्मा की
उस परमात्मा की
समय की यही पुकार
तभी होगा
वो प्रेम सत्कार
सब के जीवन में।
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